Sunday, July 4, 2021

Chaukidaar Kaha ||Zimmedaar Kaha || Satire Poetry || Social Issues || AskGovtPoetry ||Covid Time||Pendemic Situations

जिनपे हमें भरोसा और विश्वास होता है उन्हींको हम अपनी जिम्मेवारियों सौंपते हैं , और आनेवाले कुछ समय के लिए निश्चित हो जाते हैं इसी उम्मीद में की सब ठीक होगा ।
परन्तु जब परिस्थितियां प्रतिकूल दिखाई देने लगे तो फिर हमें सवाल करना पड़ता है ।


लूट रहा घर-द्वार यहां
 बिखर रहा संसार यहां
 जिम्मेवार कहां ?
 चौकीदार कहां ?
 टूट रही सांसे यहां
 बिखरी पड़ी है लाशें यहां
 श्मशानों में लकड़ी तक का इंतजाम कहां 
जिम्मेवार कहां ?
 चौकीदार कहां ?
भुखमरी, बेरोजगारी से तड़पते लोगों का आहार कहां 
जिम्मेवार कहां ?
 चौकीदार कहां ?
झुग्गी-झोपड़ी बस्ती में  
जीवन जहां है खस्ती में 
दो गज कफन का दाम कहां
हो रहा दवाइयों का व्यापार यहां 
जिम्मेवार कहां ?
 चौकीदार कहां ?
धर्म से पहले खतरे में है जान यहां
 देशभक्ति का प्रमाण कहां ?
जिम्मेवार कहां ?
 चौकीदार कहां ?

थोड़ी देर के लिए अपने दिल पर हाथ रख कर सोचोगे तो समझ में आएगा की क्या हो रहा है।
It's time for heal ,Not for Rebel.



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