Life कभी-कभी हमें ले जाकर ऐसे दोराहे पर खड़ा कर देती है की पहले किस तरफ कदम बढ़ाए, यह तय करना मुश्किल हो जाता है और उस समय हमारे सपने, उम्मीदें, कुछ धुंधला-धुंधला सा लगने लगते है,। जब हमें life Partner और life profession choose करना हो तो कुछ ऐसी ही दुविधाएं आती है , कुछ ऐसी ही दुखड़ा ये कविता भी सुनाती है, गौर फरमाइएगा ,।
हम इधर उधर के
उलूल -जूलूल की बातें में खोने लगे है ,
सपने शायद सोने लगे है ।
इतनी भी आसां कहां है
मंजील को पाना,
सफर है लम्बा , मेहनत है ज्यादा।
ये सोचकर
सिर्फ बैठे- बैठे,
मन में ख्याली ख़्याल बोने लगे है,
सपने शायद सोने लगे है।
जब बड़ा हो लक्ष्य तो समर्पण बड़ी हो,
पर हुई गड़बड़ी, दिल लगाने लगे है,
मंजील को छोड़,
मृगनयनी के नयनों में खोने लगे है,
सपने शायद सोने लगे है,
ये ऐसी है उम्र की दो तरफा मोहब्बत,
कभी ये बुलाए,कभी वो रिझाए
नौकरी या लुगाई,
दोनों एक साथ है आई, क्या करूं मैं भाई,
हम यूं ही हंसते-हंसते रोने लगे है,
सपने शायद सोने लगे है।
क्या आप भी तो किसी ऐसे ही दो राहें पर खड़े नहीं है ?
अगर है ,तो नीचे comment box आप ही के लिए है, लिख डालिए अपने मन के उद्गार । बहुत बहुत शुक्रिया।
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