Sunday, July 11, 2021

Bachpan ki yaadein|Hindikavita|PoemNagari|Memories of the Childhood|Yaadein Bachpan ki|Best Poetry On Childhood|बचपन की यादें

ये दौलत भी ले लो ,
ये शोहरत भी ले लो ,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
 वो कागज़ की कश्ती,वो बारिश का पानी,

वो मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा
भुलाऐ नहीं भुल सकता है कोई
वो छोटी सी रातें ,वो लम्बी कहानी
 वो कागज़ की कश्ती,वो बारिश का पानी,

भला कौन होगा जिसे जगजीत सिंह की यह गजल सुन बचपन की यादें ना आती हो, भले ही हम सभी जीवन की व्यस्तता में खुद को ही भुल गए हो मगर बचपन
 की यादें इतनी प्यारी होती है जो भूलाऐ नहीं भूलती ‌।




कड़ी धूप में अपने घर से निकलना 
वो चिड़िया , वो बुलबुल ,वो तितली पकड़ना
वो गुडिया की शादी में लड़ना-झगड़ना
वो झूलों से गिरना , वो गिरकर सम्भलना
वो पीतल की छल्लों के प्यारे से तौफे,
वो टुटी हुईं चुड़ियों की निशानी,
कभी रेत के ऊंचे टिलो पे जाना ,
घरौंदे बनाना , बनाकर मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख्वाबों -खिलौनो की जागीर अपनी ,
ना दुनिया का ग़म था ना रिश्तों के बंधन,
बड़ी खुबसूरत थी वो जिन्देगानी ‌।
 वो कागज़ की कश्ती,वो बारिश का पानी,

शायद यह गजल सुनकर आप भी अब तक बचपन में लौट गए होंगे, तो आइए बचपन की यादों को फिर से ताज़ा करते हैं प्रस्तुत कविताओं के माध्यम से -


 
क्या याद है तुम्हे,
 बचपन की वो यादें,
वो पापा का डांटना, मां का दुलारना
चांदा मामा अरे आव,बारे आव 
सोने के कटोरवा में दूध भात लेले आव 
यूं लोरी सुन-सुन कर खाना खाना 
गांव के मेले की वो गाड़ी
पांच की मिलती थी पिचकारी,
ठेले का केला,
बम्बईया मिठाई,
कितनी ही बार पैसे चुराकर खाई
वो राजा रानी चोर सिपाही
वो गुल्ली-डंडा, छुप्पन- छुपाई
वो चुन्नीया से झगड़ा 
वो छोटू से प्यार

वो भाई का नखड़ा
 वो दीदी का प्यार 

वो मम्मी से रुठना , वो पापा से डरना

वो छोटी सी बातों पे खुब झगड़ना

बचपन की जब भी याद आती है ,
दिल तड़पता है , आंखें भर आती है ।

कुछ यूं ही मनभावन होता है बचपन- इस बचपन में





ना केरियर का कोई फिक्र था, 
ना ब्रेकअप का कोई जिक्र था, 
ना लाइफ में कोई टेंशन था। 
बस खाना, खेलना और सोना, 
बचपन का यही Agenda था। 
बस कुछ यू ही रहना हमारा फंडा था।
बचपन का यही Agenda था।। 


स्कूल ना जाने के रहते कई बहाने थे, 
गीली- डंडा, छुपन - छुपाई और कंचे खेल, 
 करते कुछ ऐसे कारनामे थे। 
जब marks sheet में मिलता कभी अंड़ा था,
तो खाना पड़ता डंडा था,
बचपन का यही Agenda था। 
बस कुछ यू ही रहना हमारा फंडा था।
बचपन का यही Agenda था।। 


ना किसी लड़की का चक्कर था, 
ना कोई प्लेसमेंट का डर था। 
बस अपने हर एक पल को जीने का एक जुनून था। 
बस यू ही मज़े मे रहना हमारा धंधा था, 
बचपन का यही Agenda था। 
बस कुछ यू ही रहना हमारा फंडा था।
बचपन का यही Agenda था।।


गर्मियों की छुट्टीओ मे, 
कुछ यू धूम मचाया करते थे।
लेट से जगना, धूप में खेलना, बेवजह खुरापात करना 
और अच्छी खासी, चलती फिरती चीजों को भी 
खोल- खाल कर
 खराब करना, 

बचपन में कुछ यही Agenda था। 
बस कुछ यू ही रहना हमारा फंडा था।
बचपन का यही Agenda था।।
हमे जीने का मज़ा बचपन ही सिखाता है। 
और Life मे सबसे ज्यादा मज़ा बचपन मे ही आता है।।


 वो सारे दिन कहां खो गए,
जाने हम कब बड़े हो गए ।


ये सारी कविताएं मेरे कुछ प्यारे मित्रो के सहयोग के बिना संभव नहीं हो पाता, जिनमें गोल्डू, प्रियांशु, जसिका और डॉली शामिल हैं, आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया।


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