Sunday, January 9, 2022

रश्मिरथी || सप्तम सर्ग || रामधारी सिंह दिनकर || Part-23 || PoemNagari

प्यारे मित्रों, हम सभी रश्मिरथी सप्तम सर्ग सुन रहे हैं , पीछले अंक में हम सब ने सुना कि युद्ध भूमि में कर्ण युधिष्ठिर समेत भीम , नकुल और सहदेव को बार बार धेर कर भी नहीं मरता , आखिर वह ऐसा क्यों करता है , ये बात आप जानते होंगे , कर्ण ऐसे ही दानवीर नहीं कहलाता ...भले ही वह इस संग्राम में दुश्मनों को घूल चटा रहा है पर आपने मां को दिए वचन को भी संजोए रखा है - अब आगे की कहानी सुनाते हैं -

ये चार फुल हैं मोल किन्हीं कातर नयनों के पानी के,
ये चार फुल प्रच्छन्न दान हैं किसी महाबल दानी के ।
ये चार फुल, मेरा अदृष्ट था हुआ कभी जिनका कामी,
ये चार फुल पाकर प्रसन्न हंसते होंगे अन्तर्यामी ।'
'समझोगे नहीं शल्य इसको, यह करतब नादानों का हैं,
ये खेल जीत से बडे क़िसी मकसद के दीवानों का हैं ।
जानते स्वाद इसका वे ही, जो सुरा स्वप्न की पीते हैं,
दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग खडे ज़ो जीते हैं ।'
समझा न, सत्य ही, शल्य इसे, बोला 'प्रलाप यह बन्द करो,
हिम्मत हो तो लो करो समर,बल हो, तो अपना धनुष धरो ।
लो, वह देखो, वानरी ध्वजा दूर से दिखायी पडती है,
पार्थ के महारथ की घर्घर आवाज सुनायी पडती है ।'
'क्या वेगवान हैं अश्व ! देख विधुत् शरमायी जाती है,
आगे सेना छंट रही, घटा पीछे से छायी जाती है ।
राधेय ! काल यह पहुंच गया, शायक सन्धानित तूर्ण करो,
थे विकल सदा जिसके हित, वह लालसा समर की पूर्ण करो ।'
पार्थ को देख उच्छल-उमंग-पूरित उर-पारावार हुआ,
दम्भोलि-नाद कर कर्ण कुपित अन्तक-सा भीमाकार हुआ ।
बोला 'विधि ने जिस हेतु पार्थ ! हम दोनों का निर्माण किया,
जिस लिए प्रकृति के अनल-तत्त्व का हम दोनों ने पान किया ।
'जिस दिन के लिए किये आये, हम दोनों वीर अथक साधन,
आ गया भाग्य से आज जन्म-जन्मों का निर्धारित वह क्षण ।
आओ, हम दोनों विशिख-वह्नि-पूजित हो जयजयकार करें,
ममच्छेदन से एक दूसरे का जी-भर सत्कार करें ।'
'पर, सावधान, इस मिलन-बिन्दु से अलग नहीं होना होगा,
हम दोनों में से किसी एक को आज यहीं सोना होगा ।
हो गया बडा अतिकाल, आज निर्णय अन्तिम कर लेना है,
शत्रु का या कि अपना मस्तक, काट कर यहीं धर देना है ।'
कर्ण का देख यह दर्प पार्थ का, दहक उठा रविकान्त-हृदय,
बोला, 'रे सारथि-पुत्र ! किया तू ने, सत्य ही योग्य निश्चय ।
पर कौन रहेगा यहां ? बात यह अभी बताये देता हूं,
धड़ पर से तेरा सीस मूढ ! ले, अभी हटाये देता हूं ।'
यह कह अर्जुन ने तान कान तक, धनुष-बाण सन्धान किया,
अपने जानते विपक्षी को हत ही उसने अनुमान किया ।
पर, कर्ण झेल वह महा विशिक्ष, कर उठा काल-सा अट्टहास,
रण के सारे स्वर डूब गये, छा गया निनद से दिशाकाश ।
बोला, 'शाबाश, वीर अर्जुन ! यह खूब गहन सत्कार रहा;
पर, बुरा न मानो, अगर आन कर मुझ पर वह बेकार रहा ।
मत कवच और कुण्डल विहीन, इस तन को मृदुल कमल समझो,
साधना-दीप्त वक्षस्थल को, अब भी दुर्भेद अचल समझो ।'
'अब लो मेरा उपहार, यही यमलोक तुम्हें पहुंचायेगा,
जीवन का सारा स्वाद तुम्हें बस, इसी बार मिल जायेगा ।'
कह इस प्रकार राधेय अधर को दबा, रौद्रता में भरके,
हुङकार उठा घातिका शक्ति विकराल शरासन पर धरके ।'
संभलें जब तक भगवान्, नचायें इधर-उधर किञ्चित स्यन्दन,
तब तक रथ में ही, विकल, विध्द, मूच्र्छित हो गिरा पृथानन्दन ।
कर्ण का देख यह समर-शौर्य सङगर में हाहाकार हुआ,
सब लगे पूछने, 'अरे, पार्थ का क्या सचमुच संहार हुआ ?'
पर नहीं, मरण का तट छूकर, हो उठा अचिर अर्जुन प्रबुध्द;
क्रोधान्ध गरज कर लगा कर्ण के साथ मचाने द्विरथ-युध्द ।
प्रावृट्-से गरज-गरज दोनों, करते थे प्रतिभट पर प्रहार,
थी तुला-मध्य सन्तुलित खडी, लेकिन दोनों की जीत हार ।
इस ओर कर्ण र्मात्तण्ड-सदृश, उस ओर पार्थ अन्तक-समान,
रण के मिस, मानो, स्वयं प्रलय, हो उठा समर में मूर्तिमान ।
जूझता एक क्षण छोड, स्वत:, सारी सेना विस्मय-विमुग्ध,
अपलक होकर देखने लगी दो शितिकण्ठों का विकट युध्द ।
है कथा, नयन का लोभ नहीं, संवृत कर सके स्वयं सुरगण,
भर गया विमानों से तिल-तिल, कुरुभू पर कलकल-नदित-गगन ।
थी रुकी दिशा की सांस, प्रकृति के निखिल रुप तन्मय-गभीर,
ऊपर स्तम्भित दिनमणि का रथ, नीचे नदियों का अचल नीर ।
अहा ! यह युग्म दो अद्भुत नरों का,
महा मदमत्त मानव- कुंजरों का;
नृगुण के मूर्तिमय अवतार ये दो,
मनुज-कुल के सुभग श्रृंगार ये दो।
परस्पर हो कहीं यदि एक पाते,
ग्रहण कर शील की यदि टेक पाते,
मनुजता को न क्या उत्थान मिलता ?
अनूठा क्या नहीं वरदान मिलता ?
मनुज की जाति का पर शाप है यह,
अभी बाकी हमारा पाप है यह,
बड़े जो भी कुसुम कुछ फूलते हैं,
अहँकृति में भ्रमित हो भूलते हैं ।
नहीं हिलमिल विपिन को प्यार करते,
झगड़ कर विश्व का संहार करते ।
जगत को डाल कर नि:शेष दुख में,
शरण पाते स्वयं भी काल-मुख में ।
चलेगी यह जहर की क्रान्ति कब तक ?
रहेगी शक्ति-वंचित शांति कब तक ?
मनुज मनुजत्व से कब तक लड़ेगा ?
अनल वीरत्व से कब तक झड़ेगा ?
विकृति जो प्राण में अंगार भरती,
हमें रण के लिए लाचार करती,
घटेगी तीव्र उसका दाह कब तक ?
मिलेगी अन्य उसको राह कब तक ?
हलाहल का शमन हम खोजते हैं,
मगर, शायद, विमन हम खोजते हैं,
बुझाते है दिवस में जो जहर हम,
जगाते फूंक उसको रात भर हम ।
किया कुंचित, विवेचन व्यस्त नर का,
हृदय शत भीति से संत्रस्त नर का ।
महाभारत मही पर चल रहा है,
भुवन का भाग्य रण में जल रहा है ।
चल रहा महाभारत का रण,
जल रहा धरित्री का सुहाग,
फट कुरुक्षेत्र में खेल रही
नर के भीतर की कुटिल आग ।
बाजियों-गजों की लोथों में
गिर रहे मनुज के छिन्न अंग,
बह रहा चतुष्पद और द्विपद
का रुधिर मिश्र हो एक संग ।
गत्वर, गैरेय, सुघर भूधर-से
लिये रक्त-रंजित शरीर,
थे जूझ रहे कौन्तेय-कर्ण
क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर ।
दोनों रणकृशल धनुर्धर नर,
दोनों समबल, दोनों समर्थ,
दोनों पर दोनों की अमोघ
थी विशिख-वृष्टि हो रही व्यर्थ ।
इतने में शर के कर्ण ने देखा जो अपना निषङग,
तरकस में से फुङकार उठा, कोई प्रचण्ड विषधर भूजङग,
कहता कि 'कर्ण! मैं अश्वसेन विश्रुत भुजंगो का स्वामी हूं,
जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हूं ।
'बस, एक बार कर कृपा धनुष पर चढ शरव्य तक जाने दे,
इस महाशत्रु को अभी तुरत स्यन्दन में मुझे सुलाने दे ।
कर वमन गरल जीवन भर का सञ्चित प्रतिशोध उतारूंगा,
तू मुझे सहारा दे, बढक़र मैं अभी पार्थ को मारूंगा ।'
राधेय जरा हंसकर बोला, 'रे कुटिल! बात क्या कहता है ?
जय का समस्त साधन नर का अपनी बांहों में रहता है ।
उस पर भी सांपों से मिल कर मैं मनुज, मनुज से युध्द करूं ?
जीवन भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुध्द करूं ?'
'तेरी सहायता से जय तो मैं अनायास पा जाऊंगा,
आनेवाली मानवता को, लेकिन, क्या मुख दिखलाऊंगा ?
संसार कहेगा, जीवन का सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया;
प्रतिभट के वध के लिए सर्प का पापी ने साहाय्य लिया ।'
'रे अश्वसेन ! तेरे अनेक वंशज हैं छिपे नरों में भी,
सीमित वन में ही नहीं, बहुत बसते पुर-ग्राम-घरों में भी ।
ये नर-भुजङग मानवता का पथ कठिन बहुत कर देते हैं,
प्रतिबल के वध के लिए नीच साहाय सर्प का लेते हैं ।'
'ऐसा न हो कि इन सांपो में मेरा भी उज्ज्वल नाम चढे ।
पाकर मेरा आदर्श और कुछ नरता का यह पाप बढे ।
अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु वह सर्प नहीं, नर ही तो है,
संघर्ष सनातन नहीं, शत्रुता इस जीवन भर ही तो है ।'
'अगला जीवन किसलिए भला, तब हो द्वेषान्ध बिगाडं मैं ?
सांपो की जाकर शरण, सर्प बन क्यों मनुष्य को मारूं मैं ?
जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता,
मैं किसी हेतु भी यह कलङक अपने पर नहीं लगा सकता ।'
काकोदर को कर विदा कर्ण, फिर बढ़ा समर में गर्जमान,
अम्बर अनन्त झंकार उठा, हिल उठे निर्जरों के विमान ।
तूफ़ान उठाये चला कर्ण बल से धकेल अरि के दल को,
जैसे प्लावन की धार बहाये चले सामने के जल को।
पाण्डव-सेना भयभीत भागती हुई जिधर भी जाती थी;
अपने पीछे दौडते हुए वह आज कर्ण को पाती थी ।
रह गयी किसी के भी मन में जय की किञ्चित भी नहीं आश,
आखिर, बोले भगवान् सभी को देख व्याकुल हताश ।
'अर्जुन ! देखो, किस तरह कर्ण सारी सेना पर टूट रहा,
किस तरह पाण्डवों का पौरुष होकर अशंक वह लूट रहा ।
देखो जिस तरफ़, उधर उसके ही बाण दिखायी पडते हैं,
बस, जिधर सुनो, केवल उसके हुंकार सुनायी पडते हैं ।'
'कैसी करालता ! क्या लाघव ! कितना पौरुष ! कैसा प्रहार !
किस गौरव से यह वीर द्विरद कर रहा समर-वन में विहार !
व्यूहों पर व्यूह फटे जाते, संग्राम उजडता जाता है,
ऐसी तो नहीं कमल वन में भी कुञ्जर धूम मचाता है ।'
'इस पुरुष-सिंह का समर देख मेरे तो हुए निहाल नयन,
कुछ बुरा न मानो, कहता हूं, मैं आज एक चिर-गूढ वचन ।
कर्ण के साथ तेरा बल भी मैं खूब जानता आया हूं,
मन-ही-मन तुझसे बडा वीर, पर इसे मानता आया हूं ।'
औ' देख चरम वीरता आज तो यही सोचता हूं मन में,
है भी कोई, जो जीत सके, इस अतुल धनुर्धर को रण में ?
मैं चक्र सुदर्शन धरूं और गाण्डीव अगर तू तानेगा,
तब भी, शायद ही, आज कर्ण आतंक हमारा मानेगा ।'
'यह नहीं देह का बल केवल, अन्तरनभ के भी विवस्वान्,
हैं किये हुए मिलकर इसको इतना प्रचण्ड जाज्वल्यमान ।
सामान्य पुरुष यह नहीं, वीर यह तपोनिष्ठ व्रतधारी है;
मृत्तिका-पुञ्ज यह मनुज ज्योतियों के जग का अधिकारी है ।'
'कर रहा काल-सा घोर समर, जय का अनन्त विश्वास लिये,
है घूम रहा निर्भय, जानें, भीतर क्या दिव्य प्रकाश लिये !
जब भी देखो, तब आंख गडी सामने किसी अरिजन पर है,
भूल ही गया है, एक शीश इसके अपने भी तन पर है ।'
'अर्जुन ! तुम भी अपने समस्त विक्रम-बल का आह्वान करो,
अर्जित असंख्य विद्याओं का हो सजग हृदय में ध्यान करो ।
जो भी हो तुममें तेज, चरम पर उसे खींच लाना होगा,
तैयार रहो, कुछ चमत्कार तुमको भी दिखलाना होगा ।'
दिनमणि पश्चिम की ओर ढले देखते हुए संग्राम घोर,
गरजा सहसा राधेय, न जाने, किस प्रचण्ड सुख में विभोर ।
'सामने प्रकट हो प्रलय ! फाड़ तुझको मैं राह बनाऊंगा,
जाना है तो तेरे भीतर संहार मचाता जाऊंगा ।'
'क्या धमकाता है काल ? अरे, आ जा, मुट्ठी में बन्द करूं ।
छुट्टी पाऊं, तुझको समाप्त कर दूं, निज को स्वच्छन्द करूं ।
ओ शल्य ! हयों को तेज करो, ले चलो उड़ाकर शीघ्र वहां,
गोविन्द-पार्थ के साथ डटे हों चुनकर सारे वीर जहां ।'
'हो शास्त्रों का झन-झन-निनाद, दन्तावल हों चिंग्घार रहे,
रण को कराल घोषित करके हों समरशूर हुंकार रहे,
कटते हों अगणित रुण्ड-मुण्ड, उठता होर आर्त्तनाद क्षण-क्षण,
झनझना रही हों तलवारें; उडते हों तिग्म विशिख सन-सन ।'
संहार देह धर खड़ा जहां अपनी पैंजनी बजाता हो,
भीषण गर्जन में जहां रोर ताण्डव का डूबा जाता हो ।
ले चलो, जहां फट रहा व्योम, मच रहा जहां पर घमासान,
साकार ध्वंस के बीच पैठ छोड़ना मुझे है आज प्राण ।'
आज के लिए बस इतना ही,
आगे की कहानी अगले भाग में,
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Saturday, January 8, 2022

बसंती हवा || हिंदी कविता || केदारनाथ अग्रवाल || PoemNagari || Recited By Kishor

नये साल का पहला महीना , हम सब में एक नया उमंग जोश उत्साह और जूनून से भरा होता है , पीछले साल की चुनौतियों से हम सभी बहुत कुछ सीख चुके होते हैं ..और नये साल में what to do or what to not do ...का एक New , fresh Resolution , संकल्प हमारे पास होता है । लेकिन कहते हैं होईहे वहीं जो राम रची राखा । हमारे destiny में क्या लिखा है कोई नही जाता , लेकिन एक बात जरूर fix है ,की हमारे मेहनत , हमारे आत्मविश्वास से बढ़ाएं हर एक वे साहसी कदम हमारे जीवन निर्माण की दिशा तय करती है -
 Let's free yourself like the बसंती हवा ...और आईए सुनते a beautiful poem , written by केदारनाथ अग्रवाल ...Poem का शीर्षक है बसंती हवा - 
I hope you must have read this poem in class 9th or 10th,...let us once again bring back those memories.

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ
वही हाँ, वही जो युगों से गगन को
बिना कष्ट-श्रम के सम्हाले हुए है
हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ
वही हाँ, वही जो धरा की बसंती
सुसंगीत मीठा गुंजाती फिरी हूँ
हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ
वही हाँ, वही जो सभी प्राणियों को
पिला प्रेम-आसन जिलाए हुई हूँ
हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ
कसम रूप की है, कसम प्रेम की है
कसम इस हृदय की, सुनो बात मेरी--
अनोखी हवा हूँ बड़ी बावली हूँ
बड़ी मस्तमौला। न
हीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ।
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ, मुसाफिर अजब हूँ।
न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की, न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ।
हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!
जहाँ से चली मैं जहाँ को गई मैं -
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं झुमाती चली मैं!
हवा हूँ, हवा मै बसंती हवा हूँ।
चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा, किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं, हरे खेत पहुँची -
वहाँ, गेंहुँओं में लहर खूब मारी।
पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!
खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी -
हिलाया-झुलाया गिरी पर न कलसी!
इसी हार को पा,
हिलाई न सरसों, झुलाई न सरसों,
मज़ा आ गया तब,
न सुधबुध रही कुछ,
बसंती नवेली भरे गात में थी
हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!
मुझे देखते ही अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया, न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा-
पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!

Wednesday, January 5, 2022

रश्मिरथी || सप्तम सर्ग || रामधारी सिंह दिनकर || PoemNagari || Recited By Kishor || Part-22

प्यारे मित्रों, हम सभी रश्मिरथी सप्तम सर्ग सुन रहे हैं , पीछले अंक में हमने सुना , कैसे कर्ण अपने सभी सद्कर्मों को भी जाग्रृत कर उसे उसके साथ युद्ध में आने को आमंत्रित करता है -  अब आगे की कहानी सुनाते हैं _ 
रथ सजा, भेरियां घमक उठीं, गहगहा उठा अम्बर विशाल,
कूदा स्यन्दन पर गरज कर्ण ज्यों उठे गरज क्रोधान्ध काल ।
बज उठे रोर कर पटह-कम्बु, उल्लसित वीर कर उठे हूह,
उच्छल सागर-सा चला कर्ण को लिये क्षुब्ध सैनिक-समूह ।
हेषा रथाश्व की, चक्र-रोर, दन्तावल का वृहित अपार,
टंकार धुनुर्गुण की भीषण, दुर्मद रणशूरों की पुकार ।
खलमला उठा ऊपर खगोल, कलमला उठा पृथ्वी का तन,
सन-सन कर उड़ने लगे विशिख, झनझना उठी असियाँ झनझन ।
तालोच्च-तरंगावृत बुभुक्षु-सा लहर उठा संगर-समुद्र,
या पहन ध्वंस की लपट लगा नाचने समर में स्वयं रुद्र ।
हैं कहाँ इन्द्र ? देखें, कितना प्रज्वलित मर्त्य जन होता है ?
सुरपति से छले हुए नर का कैसा प्रचण्ड रण होता है ?
अङगार-वृष्टि पा धधक उठ जिस तरह शुष्क कानन का तृण,
सकता न रोक शस्त्री की गति पुञ्जित जैसे नवनीत मसृण ।
यम के समक्ष जिस तरह नहीं चल पाता बध्द मनुज का वश,
हो गयी पाण्डवों की सेना त्योंही बाणों से विध्द, विवश ।
भागने लगे नरवीर छोड वह दिशा जिधर भी झुका कर्ण,
भागे जिस तरह लवा का दल सामने देख रोषण सुपर्ण !
'रण में क्यों आये आज ?' लोग मन-ही-मन में पछताते थे,
दूर से देखकर भी उसको, भय से सहमे सब जाते थे ।
काटता हुआ रण-विपिन क्षुब्ध, राधेय गरजता था क्षण-क्षण ।
सुन-सुन निनाद की धमक शत्रु का, व्यूह लरजता था क्षण-क्षण ।अरि की सेना को विकल देख, बढ चला और कुछ समुत्साह;
कुछ और समुद्वेलित होकर, उमडा भुज का सागर अथाह ।
गरजा अशङक हो कर्ण, 'शल्य ! देखो कि आज क्या करता हूं,
कौन्तेय-कृष्ण, दोनों को ही, जीवित किस तरह पकडता हूं ।
बस, आज शाम तक यहीं सुयोधन का जय-तिलक सजा करके,
लौटेंगे हम, दुन्दुभि अवश्य जय की, रण-बीच बजा करके ।
इतने में कुटिल नियति-प्रेरित पड ग़ये सामने धर्मराज,
टूटा कृतान्त-सा कर्ण, कोक पर पडे टूट जिस तरह बाज ।
लेकिन, दोनों का विषम युध्द, क्षण भर भी नहीं ठहर पाया,
सह सकी न गहरी चोट, युधिष्ठर की मुनि-कल्प, मृदुल काया ।
भागे वे रण को छोड, क़र्ण ने झपट दौडक़र गहा ग्रीव,
कौतुक से बोला, 'महाराज ! तुम तो निकले कोमल अतीव ।
हां, भीरु नहीं, कोमल कहकर ही, जान बचाये देता हूं ।
आगे की खातिर एक युक्ति भी सरल बताये देता हूं ।
'हैं विप्र आप, सेविये धर्म, तरु-तले कहीं, निर्जन वन में,
क्या काम साधुओं का, कहिये, इस महाघोर, घातक रण में ?
मत कभी क्षात्रता के धोखे, रण का प्रदाह झेला करिये,
जाइये, नहीं फिर कभी गरुड क़ी झपटों से खेला करिये ।'
भागे विपन्न हो समर छोड ग्लानि में निमज्जित धर्मराज,
सोचते, "कहेगा क्या मन में जानें, यह शूरों का समाज ?
प्राण ही हरण करके रहने क्यों नहीं हमारा मान दिया ?
आमरण ग्लानि सहने को ही पापी ने जीवन-दान दिया ।"
समझे न हाय, कौन्तेय ! कर्ण ने छोड दिये, किसलिए प्राण,
गरदन पर आकर लौट गयी सहसा, क्यों विजयी की कृपाण ?
लेकिन, अदृश्य ने लिखा, कर्ण ने वचन धर्म का पाल दिया,
खड्ग का छीन कर ग्रास, उसे मां के अञ्चल में डाल दिया ।
कितना पवित्र यह शील ! कर्ण जब तक भी रहा खडा रण में,
चेतनामयी मां की प्रतिमा घूमती रही तब तक मन में ।
सहदेव, युधिष्ठर, नकुल, भीम को बार-बार बस में लाकर,
कर दिया मुक्त हंस कर उसने भीतर से कुछ इङिगत पाकर ।
देखता रहा सब श्लय, किन्तु, जब इसी तरह भागे पवितन,
बोला होकर वह चकित, कर्ण की ओर देख, यह परुष वचन,
'रे सूतपुत्र ! किसलिए विकट यह कालपृष्ठ धनु धरता है ?
मारना नहीं है तो फिर क्यों, वीरों को घेर पकडता है ?'
'संग्राम विजय तू इसी तरह सन्ध्या तक आज करेगा क्या ?
मारेगा अरियों को कि उन्हें दे जीवन स्वयं मरेगा क्या ?
रण का विचित्र यह खेल, मुझे तो समझ नहीं कुछ पडता है,
कायर ! अवश्य कर याद पार्थ की, तू मन ही मन डरता है ।'
हंसकर बोला राधेय, 'शल्य, पार्थ की भीति उसको होगी,
क्षयमान्, क्षनिक, भंगुर शरीर पर मृषा प्रीति जिसको होगी ।
इस चार दिनों के जीवन को, मैं तो कुछ नहीं समझता हूं,
करता हूं वही, सदा जिसको भीतर से सही समझता हूं ।
'पर ग्रास छीन अतिशय बुभुक्षु, अपने इन बाणों के मुख से,
होकर प्रसन्न हंस देता हूं, चञ्चल किस अन्तर के सुख से;
यह कथा नहीं अन्त:पुर की, बाहर मुख से कहने की है,
यह व्यथा धर्म के वर-समान, सुख-सहित, मौन सहने की है ।
'सब आंख मूंद कर लडते हैं, जय इसी लोक में पाने को,
पर, कर्ण जूझता है कोई, ऊंचा सध्दर्म निभाने को,
सबके समेत पङिकल सर में, मेरे भी चरण पडेंग़े क्या ?
ये लोभ मृत्तिकामय जग के, आत्मा का तेज हरेंगे क्या ?
यह देह टूटने वाली है, इस मिट्टी का कब तक प्रमाण ?
मृत्तिका छोड ऊपर नभ में भी तो ले जाना है विमान ।
कुछ जुटा रहा सामान खमण्डल में सोपान बनाने को,
ये चार फुल फेंके मैंने, ऊपर की राह सजाने को
आज के लिए बस इतना ही,
आगे की कहानी अगले भाग में,
अगले भाग की कहानी आती ही आपको सबसे पहले पता चले, इसके लिए PoemNagari को Subscribe कर bell icon को on कर लें,
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Tuesday, January 4, 2022

संसार || हिंदी कविता || महादेवी वर्मा || PoemNagari || कितना पागल है संसार || Recited By Kishor

प्रस्तुत कविता महादेवी वर्मा जी द्वारा लिखित है ।
निश्वासों का नीड़, निशा का
बन जाता जब शयनागार,
लुट जाते अभिराम छिन्न
मुक्तावलियों के बन्दनवार,

तब बुझते तारों के नीरव नयनों का यह हाहाकार,
आँसू से लिख लिख जाता है ’कितना अस्थिर है संसार’!

हँस देता जब प्रात, सुनहरे
अंचल में बिखरा रोली,
लहरों की बिछलन पर जब
मचली पड़तीं किरनें भोली,

तब कलियाँ चुपचाप उठाकर पल्लव के घूँघट सुकुमार,
छलकी पलकों से कहती हैं ’कितना मादक है संसार’!

देकर सौरभ दान पवन से
कहते जब मुरझाये फूल,
’जिसके पथ में बिछे वही
क्यों भरता इन आँखों में धूल’?

’अब इनमें क्या सार’ मधुर जब गाती भँवरों की गुंजार,
मर्मर का रोदन कहता है ’कितना निष्ठुर है संसार’!

स्वर्ण वर्ण से दिन लिख जाता
जब अपने जीवन की हार,
गोधूली, नभ के आँगन में
देती अगणित दीपक बार,

हँसकर तब उस पार तिमिर का कहता बढ बढ पारावार,
’बीते युग, पर बना हुआ है अब तक मतवाला संसार!’

स्वप्नलोक के फूलों से कर
अपने जीवन का निर्माण,
’अमर हमारा राज्य’ सोचते
हैं जब मेरे पागल प्राण,

आकर तब अज्ञात देश से जाने किसकी मृदु झंकार,
गा जाती है करुण स्वरों में ’कितना पागल है संसार!’

Friday, December 31, 2021

Happy New Year 2022 || वक़्त गुजरता गया ||Day Special || हिंदी कविता || PoemNagari

वक़्त का बदलाव ना थमा है , ना कभी थमेगा ,
सदियों से चला आ रहा सदियों तक ये चलेगा ।।
मैं भी चला तुम भी चले  एक रोज  थक गए , रूक गये
पर ये रूका , ये ना थका  चलता रहा ...
प्यारे मित्रों ,
Happy New Year 2022, नए साल की आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं।
कितना अच्छा लगता है जब लोग एक दूसरे को शुभकामनाएं देते है , की नया साल मंगलमय हो । उनकी बातों से एक नयी उमंग और उल्लास की अनुभूति होती हैं - हृदय प्रफुल्लित हो उठता है या यूं कहें कि दिल गार्डन - गार्डन हो जाता है ।
प्यारे मित्रों आपके पास भी आज सुबह से अनेकों मैसेजज आई होगी, कुछ तो ऐसी मैसेजेज भी होंगी , जो सामान्य मैसेजों से अलग होंगी , जिसमें कुछ चुटकुले होंगे, या कुछ ग़ज़लें होगी, या फिर कोई कविता या कहानी के साथ नये साल की शुभकामनाएं होगी ।
आज के दिन को कुछ खास बनाने के लिए मैं आप सभी को एक कविता सुनाऊंगा । जो कल रात को ही मैंने लिखीं हैं - उम्मीद है आपको पसंद आएगी ।
वक़्त गुजरते गए , कुछ आपने बिछड़ते गए
कुछ अपने बने गैर भी, कुछ बिगड़े सम्भलते गए
वक़्त गुजरते गए ,
सवाल जो उठे थे मन में  , इस दुनिया को देख कर 
मेरे वे सवाल सारे खुद सुलझते  गए,
वक़्त गुजरते गए, कुछ आपने बिछड़ते गए,
वक़्त गुजरते गए ।
बहुत सारे सवालों का जवाब वक़्त के हाथों में होता है, 
सही वक़्त आने पर ही उसका जवाब मिलता है ।
जानें से पहले , एक बार फिर से आप सभी को नव वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

Wednesday, December 29, 2021

यूं ही कभी पूछ लिया हो||WalkieTalkie|| Ep-03||PoemNagari|चाँद और कवि| रामधारी सिंह दिनकर की कविता

नमस्कार दोस्तों मैं आपका दोस्त किशोर आप सभी का स्वागत करता हूं walkie Talkie तीसरे इपिसोड में, हर रविवार रात के नौ बजे मैं आप सभी से मिलता हूं कुछ खट्टी-मीठी बातों के साथ एक कविता लेकर ।
        प्यारे मित्रों , ठंडी पहले से बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है, मुझे आशा है की आप सभी अपना बहुत बढ़िया से ख्याल रख रहे होंगे , आपके यहां मौसम का क्या मिजाज है ? कमेंट बॉक्स में मुझे बताएं - साथ ही यह भी ख्याल रखें कि आपके आस पास इस मौसम के मार से कोई बेहाल तो नहीं ... जिनकी आप मदद कर सकते हो ? आपके सहयोग से किसी को आराम मिले , इससे बड़े सुकून के पल क्या ही हो सकता हैं ।
  दोस्तों क्या आप कभी रात में चांद से बातें की हैं , या यूं कहें की आसमान में चांद को देख कर कुछ कल्पनाएं की है, जैसे की यूं ही कभी पूछ लिया हो - ओ चंदा मामा आप तो सदियों से इस दुनिया को निहारते आ रहे हो , तो कुछ ऐसा मुझे बताओ जो सिर्फ तुम जानते हो , क्योंकि हमारी ये छोटी-छोटी आंखें बहुत सारी चीज़ें को देख ही नहीं पाती - और फिर चांद को एक टक से निहारे हुए आपके मन में अथाह सवालों और जबाबों का सिलसिला शुरू हो गया हो - 

प्यारे मित्रों दिनकर जी एक ऐसी ही कविता है जिसका नाम है - चांद और कवि - को सुनते हैं ।

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।

जानता है तू -2 कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है
किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"

 प्यारे मित्रों आज हम जो निरंतर प्रगतिशील है ,यह हमरी कल्पना शक्ति की ही देन है, Imagination -  
इंसान imagine करता है और उसे आकार देता है - 
क्या आपने भी imagine करके कोई कविता लिखी है, तो हमें जरूर भेजें , हमें बहुत खुशी होगी , आज के लिए इतना ही । फिर मिलता हूं तब तक के लिए
मुझे इजाज़त दे, नमस्कार।

Sunday, December 26, 2021

महाभारत मही पर चल रहा है ||रश्मिरथी ||सप्तम सर्ग || Part-21 || रामधारी सिंह दिनकर ||PoemNagari

प्यारे मित्रों हम सभी आज से रश्मिरथी सप्तम सर्ग सुनेंगे, पीछले अंक में आपने सुना की कैसे भगवान श्री कृष्ण एकाघ्नी शस्त्र के प्रहार से अर्जुन को बचाते हैं , और आज के इस अंक में हम सुनेंगे की अब कर्ण अर्जुन से युद्ध के पहले अपनी बची हुई कौन-कौन सी  शक्तियों को जागृत एवं एकत्रित कर  आगे बढ़ रहा है -तो सुनते हैं ।


निशा बीती, गगन का रूप दमका,

किनारे पर किसी का चीर चमका।

क्षितिज के पास लाली छा रही है,

अतल से कौन ऊपर आ रही है ?

संभाले शीश पर आलोक-मंडल

दिशाओं में उड़ाती ज्योतिरंचल,

किरण में स्निग्ध आतप फेंकती-सी,

शिशिर कम्पित द्रुमों को सेंकती-सी,

खगों का स्पर्श से कर पंख-मोचन

कुसुम के पोंछती हिम-सिक्त लोचन,

दिवस की स्वामिनी आई गगन में,

उडा कुंकुम, जगा जीवन भुवन में ।

मगर, नर बुद्धि-मद से चूर होकर,

अलग बैठा हुआ है दूर होकर,

उषा पोंछे भला फिर आँख कैसे ?

करे उन्मुक्त मन की पाँख कैसे ?

मनुज विभ्राट् ज्ञानी हो चुका है,

कुतुक का उत्स पानी हो चुका है,

प्रकृति में कौन वह उत्साह खोजे ?

सितारों के हृदय में राह खोजे ?

विभा नर को नहीं भरमायगी यह  ?

मनस्वी को कहाँ ले जायगी यह ?

कभी मिलता नहीं आराम इसको,

न छेड़ो, है अनेकों काम इसको ।

महाभारत मही पर चल रहा है,

भुवन का भाग्य रण में जल रहा है।

मनुज ललकारता फिरता मनुज को,

मनुज ही मारता फिरता मनुज को ।

पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है,

सहेली सर्पिणी की हो चुकी है,

न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह,

निगल ही जायगी सद्धर्म को वह ।

मरे अभिमन्यु अथवा भीष्म टूटें,

पिता के प्राण सुत के साथ छूटें,

मचे घनघोर हाहाकार जग में,

भरे वैधव्य की चीत्कार जग में,

मगर, पत्थर हुआ मानव- हृदय है,

फकत, वह खोजता अपनी विजय है,

नहीं ऊपर उसे यदि पायगा वह,

पतन के गर्त में भी जायगा वह ।

पड़े सबको लिये पाण्डव पतन में,

गिरे जिस रोज द्रोणाचार्य रण में,

बड़े धर्मिंष्ठ, भावुक और भोले,

युधिष्ठिर जीत के हित झूठ बोले ।

नहीं थोड़े बहुत का भेद मानो,

बुरे साधन हुए तो सत्य जानो,

गलेंगे बर्फ में मन भी, नयन भी,

अँगूठा ही नहीं, संपूर्ण तन भी ।

नमन उनको, गये जो स्वर्ग मर कर,

कलंकित शत्रु को, निज को अमर कर,

नहीं अवसर अधिक दुख-दैन्य का है,

हुआ राधेय नायक सैन्य का है ।

जगा लो वह निराशा छोड़ करके,

द्विधा का जाल झीना तोड़ करके,

गरजता ज्योति-के आधार ! जय हो,

चरम आलोक मेरा भी उदय हो ।

बहुत धुधुआ चुकी, अब आग फूटे,

किरण सारी सिमट कर आज छुटे ।

छिपे हों देवता ! अंगार जो भी,"

दबे हों प्राण में हुंकार जो भी,

उन्हें पुंजित करो, आकार दो हे !

मुझे मेरा ज्वलित श्रृंगार दो हे !

पवन का वेग दो, दुर्जय अनल दो,

विकर्तन ! आज अपना तेज-बल दो !

मही का सूर्य होना चाहता हूँ,

विभा का तूर्य होना चाहता हूँ।

समय को चाहता हूँ दास करना,

अभय हो मृत्यु का उपहास करना ।

भुजा की थाह पाना चाहता हूँ,

हिमालय को उठाना चाहता हूँ,

समर के सिन्धु को मथ कर शरों से,

धरा हूँ चाहता श्री को करों से ।

ग्रहों को खींच लाना चाहता हूँ,

हथेली पर नचाना चाहता हूँ ।

मचलना चाहता हूँ धार पर मैं,

हँसा हूँ चाहता अंगार पर मैं।

समूचा सिन्धु पीना चाहता हूँ,

धधक कर आज जीना चाहता हूँ,

समय को बन्द करके एक क्षण में,

चमकना चाहता हूँ हो सघन मैं ।

असंभव कल्पना साकार होगी,

पुरुष की आज जयजयकार होगी।

समर वह आज ही होगा मही पर,

न जैसा था हुआ पहले कहीं पर ।

चरण का भार लो, सिर पर सँभालो;

नियति की दूतियो ! मस्तक झुका लो ।

चलो, जिस भाँति चलने को कहूँ मैं,

ढलो, जिस भांति ढलने को कहूँ मैं ।

न कर छल-छद्म से आघात फूलो,

पुरुष हूँ मैं, नहीं यह बात भूलो ।

कुचल दूँगा, निशानी मेट दूँगा,

चढा दुर्जय भुजा की भेंट दूँगा ।

अरी, यों भागती कबतक चलोगी ?

मुझे ओ वंचिके ! कबतक छलोगी ?

चुराओगी कहाँ तक दाँव मेरा ?

रखोगी रोक कबतक पाँव मेरा ?

अभी भी सत्त्व है उद्दाम तुमसे,

हृदय की भावना निष्काम तुमसे,

चले संघर्ष आठों याम तुमसे,

करूँगा अन्त तक संग्राम तुमसे ।

कहाँ तक शक्ति से वंचित करोगी ?

कहाँ तक सिद्धियां मेरी हरोगी ?

तुम्हारा छद्म सारा शेष होगा,

न संचय कर्ण का नि:शेष होगा ।

कवच-कुण्डल गया; पर, प्राण तो हैं,

भुजा में शक्ति, धनु पर बाण तो हैं,

गई एकघ्नि तो सब कुछ गया क्या ?

बचा मुझमें नहीं कुछ भी नया क्या ?

समर की सूरता साकार हूँ मैं,

महा मार्तण्ड का अवतार हूँ मैं।

विभूषण वेद-भूषित कर्म मेरा,

कवच है आज तक का धर्म मेरा ।

तपस्याओ ! उठो, रण में गलो तुम,

नई एकघ्नियां वन कर ढलो तुम,

अरी ओ सिद्धियों की आग, आओ;

प्रलय का तेज बन मुझमें समाओ ।

कहाँ हो पुण्य ? बाँहों में भरो तुम,

अरी व्रत-साधने ! आकार लो तुम ।

हमारे योग की पावन शिखाओ,

समर में आज मेरे साथ आओ ।

उगी हों ज्योतियां यदि दान से भी,

मनुज-निष्ठा, दलित-कल्याण से भी,

चलें वे भी हमारे साथ होकर,

पराक्रम-शौर्य की ज्वाला संजो कर ।

हृदय से पूजनीया मान करके,

बड़ी ही भक्ति से सम्मान करके,

सुवामा-जाति को सुख दे सका हूँ,

अगर आशीष उनसे ले सका हूँ,

समर में तो हमारा वर्म हो वह,

सहायक आज ही सत्कर्म हो वह ।

सहारा, माँगता हूँ पुण्य-बल का,

उजागर धर्म का, निष्ठा अचल का।

प्रवंचित हूँ, नियति की दृष्टि में दोषी बड़ा हूँ,

विधाता से किये विद्रोह जीवन में खड़ा हूँ ।

स्वयं भगवान मेरे शत्रु को ले चल रहे हैं,

अनेकों भाँति से गोविन्द मुझको छल रहे हैं।

मगर, राधेय का स्यन्दन नहीं तब भी रुकेगा,

नहीं गोविन्द को भी युध्द में मस्तक झुकेगा,

बताऊँगा उन्हें मैं आज, नर का धर्म क्या है,

समर कहते किसे हैं और जय का मर्म क्या है ।

बचा कर पाँव धरना, थाहते चलना समर को,

'बनाना ग्रास अपनी मृत्यु का योद्धा अपर को,

पुकारे शत्रु तो छिप व्यूह में प्रच्छन्न रहना,

सभी के सामने ललकार को मन मार सहना ।

प्रकट होना विपद के बीच में प्रतिवीर हो जब,

धनुष ढीला, शिथिल उसका जरा कुछ तीर हो जब ।

कहाँ का धर्म ? कैसी भर्त्सना की बात है यह ?

नहीं यह वीरता, कौटिल्य का अपघात है यह ।

समझ में कुछ न आता, कृष्ण क्या सिखला रहे हैं,

जगत को कौन नूतन पुण्य-पथ दिखला रहे हैं ।

हुआ वध द्रोण का कल जिस तरह वह धर्म था क्या ?

समर्थन-योग्य केशव के लिए वह कर्म था क्या ?

यही धर्मिष्ठता ? नय-नीति का पालन यही है ?

मनुज मलपुंज के मालिन्य का क्षालन यही है ?

यही कुछ देखकर संसार क्या आगे बढ़ेगा ?

जहाँ गोविन्द हैं, उस श्रृंग के ऊपर चढ़ेगा ?

करें भगवान जो चाहें, उन्हें सब कुछ क्षमा है,

मगर क्या वज्र का विस्फोट छींटों से थमा है ?

चलें वे बुद्धि की ही चाल, मैं बल से चलूंगा ?

न तो उनको, न होकर जिह्न अपने को छलूंगा ।

डिगाना धर्म क्या इस चार बित्त्तो की मही को ?

भुलाना क्या मरण के बाद वाली जिन्दगी को ?

बसाना एक पुर क्या लाख जन्मों को जला कर !

मुकुट गढ़ना भला क्या पुण्य को रण में गला कर ?

नहीं राधेय सत्पथ छोड़ कर अघ-ओक लेगा,

विजय पाये न पाये, रश्मियों का लोक लेगा !

विजय-गुरु कृष्ण हों, गुरु किन्तु, मैं बलिदान का हूँ;

असीसें देह को वे, मैं निरन्तर प्राण का हूँ ।

जगी, बलिदान की पावन शिखाओ,

समर में आज कुछ करतब दिखाओ ।

नहीं शर ही, सखा सत्कर्म भी हो,

धनुष पर आज मेरा धर्म भी हो ।

मचे भूडोल प्राणों के महल में,

समर डूबे हमारे बाहु-बल में ।

गगन से वज्र की बौछार छूटे,

किरण के तार से झंकार फूटे ।

चलें अचलेश, पारावार डोले;

मरण अपनी पुरी का द्वार खोले ।

समर में ध्वंस फटने जा रहा है,

महीमंडल उलटने जा रहा है ।

अनूठा कर्ण का रण आज होगा,

जगत को काल-दर्शन आज होगा ।

प्रलय का भीम नर्तन आज होगा,

वियद्व्यापी विवर्तन आज होगा ।

विशिख जब छोड़ कर तरकस चलेगा,

नहीं गोविन्द का भी बस चलेगा ।

गिरेगा पार्थ का सिर छिन्न धड़ से,

जयी कुरुराज लौटेगा समर से ।

बना आनन्द उर में छा रहा है,

लहू में ज्वार उठता जा रहा है ।

हुआ रोमांच यह सारे बदन में,

उगे हैं या कटीले वृक्ष तन में ।

अहा ! भावस्थ होता जा रहा हूँ,

जगा हूँ या कि सोता जा रहा हूँ ?

बजाओ, युद्ध के बाजे बजाओ,

सजाओ, शल्य ! मेरा रथ सजाओ ।

आज के लिए बस इतना ही,
आगे की कहानी अगले भाग में,
अगले भाग की कहानी आती  ही आपको सबसे पहले पता चले, इसके लिए PoemNagari को Subscribe कर bell icon को on कर लें,
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Saturday, December 25, 2021

Walkie Talkie ||Ep-02 ||PoemNagari

नमस्कार दोस्तों मैं आपका दोस्त किशोर आपका स्वागत करता हूं walkie Talkie के दुसरे इपिसोड में । तो कैसे हैं आप सभी । किसी ने ठीक ही कहा है की -
"जीवन में कुछ करना है तो मेहनत में विश्वास करनी चाहिए , अक्सर लोगों को हमने जुएं में किस्मत आजमाते देखें हैं ।
कभी कभी हम life में बहुत लेट हो जाते हैं एक चीज जो हमें बहुत परेशान करती रहती है वह ये है की लोग क्या सोचेंगे , लोग क्या कहेंगे , अरे ये लोगो की बातें ,लोगों को करने दो , तुम आपने विश्वास को मजबूत कर आगे बढ़ते रहो , यकीन मानो सारी मुश्किलें आसान हो जाएगी -
 तू अपनी खूबियां ढूंढ,
कमियां निकालने के लिए लोग हैं ना...
कदम रखना ही है तो आगे रख,
पीछे खींचने के लिए लोग हैं ना...

सपने देखने ही है तो ऊंचे देख,
नीचा दिखाने के लिए लोग हैैं ना...

अपने अंदर जुनून की चिंगारी भड़का,
जलने के लिए लोग हैैं ना...

अगर बनानी है तो यादें बना,
बातें बनाने के लिए लोग हैं ना...

अगर कुछ करना ही तो मोहब्बत कर,
दुश्मनी करने के लिए लोग हैं ना...

रहना है तो बच्चा बनकर रह,
समझदार बनाने के लिए लोग हैं ना ...

भरोसा रखना है तो ख़ुद पर रख,
शक करने के लिए लोग हैैं ना...

तू बस सवार ले ख़ुद को,
आईना दिखाने के लिए लोग हैं ना...

ख़ुद की अलग पहचान बना,
भीड़ में चलने के लिए लोग हैं ना...

तू कुछ करके दिखा दुनिया को,
तालियां बजाने के लिए लोग हैैं ना..

जो भी करना हैं तू आज कर
कल कहने के लिए लोग हैं ना...

तो क्या समझे , यही ना की कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम है कहना, छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत ना जाए रैना । प्यारे मित्रों ,खुद पे यकीन हो , तो डर खुद डर के भाग खड़ा होता है और सफलता आपके तरफ कदम बढ़ाने लगती है , तो स्वागत करें सफलता का जो आपके तरफ भागे चली आ रही है । और अब मुझे इजाज़त दिजिए , नमस्कार ।

Friday, December 17, 2021

Walkie Talkie Ep-01

Hello Guys , 
Walkir - Talkie  के पहले episode में आपका स्वागत है , हर रविवार रात के नौ बजे मैं आपका दोस्त किशोर आपसे मुखातिब होऊंगा ...

मुझे ठीक-ठीक याद है मैं 8th क्लास में था एक अलग ही दुनिया थी अभी के इस  दुनिया से बिल्कुल अलग थलग ,एक सुकून भरी दुनिया ।
      उस वक्त एक कविता पढ़ी थी , वो शब्द क्या कहना चाहते थे   कुछ खास मालूम नहीं पड़ता था,  बस पढ़ते रहते थे,या  यूं कहें कि  मीठ्ठू की तरह रटते रहते थे -  लेकिन अब जब वही लाइनें  दोहराता हूं तो कुछ - कुछ महसूस भी कर पाता हूं  - मैं एक काम करता हूं , पहले आपको उस कविता को सुनाता हूं , फिर आपसे एक प्रश्न पुछुगा , इस लिए ध्यान से सुनिएगा -
कविता का शीर्षक है - "जीवन का झरना"  
आरसी प्रसाद सिंह जी द्वारा लिखित हैं ।
यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है।
सुख-दुख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है।
कब फूटा गिरि के अंतर से? किस अंचल से उतरा नीचे?
किस घाटी से बह कर आया समतल में अपने को खींचे?

निर्झर में गति है, जीवन है, वह आगे बढ़ता जाता है!
धुन एक सिर्फ़ है चलने की, अपनी मस्ती में गाता है।

बाधा के रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता,
बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता।

लहरें उठती हैं, गिरती हैं; नाविक तट पर पछताता है।
तब यौवन बढ़ता है आगे, निर्झर बढ़ता ही जाता है।

निर्झर कहता है, बढ़े चलो! देखो मत पीछे मुड़ कर!
यौवन कहता है, बढ़े चलो! सोचो मत होगा क्या चल कर?

चलना है, केवल चलना है ! जीवन चलता ही रहता है !
रुक जाना है मर जाना ही, निर्झर यह झड़ कर कहता है !

निर्झर ,  Waterfall अनंतकाल से पर्वतों से जो पानी के झरने गीरते आ रहे हैं , नदियां जिससे अपना रूप लेती है और कल - कल बहती जाती हैं , रास्तों के बाधाओं से जुझती , लड़ती - भीड़ती है , लेकिन रूकती नहीं, थमती नही ।
आखिरी की दो लाइनें -  कितना कुछ कहती कह जाती है, आपने गौर किया ?

चलना है, केवल चलना है ! जीवन चलता ही रहता है !
रुक जाना है मर जाना ही, निर्झर यह झड़ कर कहता है !

यानी  - गतिशीलता ही जीवन हैं और ठहराव मौत ।
इससे सरल और simple क्या ही हो सकती जीवन को समझने के लिए ।
प्यारे मित्रों , आप जीवन को कैसे अनुभव करते हैं ? क्या वाकई में जीवन निर्झर के समान है या कोई और परिभाषा जो जीवन को और आसानी से  समझने में हमारी मदद कर सकती हैं - आपके द्वारा साझा की गई  सही  अनुभव इस परिभाषा को और समृद्ध करेंगे । 

Friday, December 10, 2021

तमाशा || हिंदी कविता || अशोक चक्रधर || Recited by Kishor || PoemNagari

प्रस्तुत कविता अशोक चक्रधर जी द्वारा लिखित है।

कविता शीर्षक - तमाशा
लेखक - अशोक चक्रधर

अब मैं आपको कोई कविता नहीं सुनाता
एक तमाशा दिखाता हूँ 
और आपके सामने एक मजमा लगाता हूँ।
ये तमाशा कविता से बहूत दूर है,
दिखाऊँ साब, मंजूर है?
कविता सुनने वालो
ये मत कहना कि कवि होकर
मजमा लगा रहा है,
और कविता सुनाने के बजाय
यों ही बहला रहा है।
दरअसल, एक तो पापी पेट का सवाल है
और दूसरे, देश का दोस्तो ये हाल है
कि कवि अब फिर से एक बार
मजमा लगाने को मजबूर है,
तो दिखाऊँ साब, मंजूर है?
बोलिए जनाब बोलिए हुजूर!
तमाशा देखना मंजूर?
थैंक्यू, धन्यवाद, शुक्रिया,
आपने 'हाँ' कही बहुत अच्छा किया।
आप अच्छे लोग हैं बहुत अच्छे श्रोता हैं
और बाइ-द-वे तमाशबीन भी खूब हैं,
देखिए मेरे हाथ में ये तीन टैस्ट-ट्यूब हैं।

कहाँ हैं?
ग़ौर से देखिए ध्यान से देखिए,
मन की आँखों से कल्पना की पाँखों से देखिए।
देखिए यहाँ हैं।
क्या कहा, उँगलियाँ हैं?
नहीं - नहीं टैस्ट-ट्यूब हैं
इन्हें उँगलियाँ मत कहिए,
तमाशा देखते वक्त दरियादिल रहिए।
आप मेरे श्रोता हैं, रहनुमा हैं, सुहाग हैं
मेरे महबूब हैं,
अब बताइए ये क्या हैं?
तीन टैस्ट-ट्यूब हैं।
वैरी गुड, थैंक्यू, धन्यवाद, शुक्रिया,
आपने उँगलियों को टैस्ट-ट्यूब बताया
बहुत अच्छा किया
अब बताइए इनमें क्या है?
बताइए-बताइए इनमें क्या है?
अरे, आपको क्या हो गया है?
टैस्ट-ट्यूब दिखती है
अंदर का माल नहीं दिखता है,
आपके भोलेपन में भी अधिकता है।

ख़ैर छोड़िए
ए भाईसाहब!
अपना ध्यान इधर मोड़िए।
चलिए, मुद्दे पर आता हूँ,
मैं ही बताता हूँ, इनमें खून है!
हाँ भाईसाहब, हाँ बिरादर,
हाँ माई बाप हाँ गॉड फादर! इनमें खून हैं।
पहले में हिंदू का
दूसरे में मुसलमान का
तीसरे में सिख का खून है,
हिंदू मुसलमान में तो आजकल
बड़ा ही जुनून हैं।
आप में से जो भी इनका फ़र्क बताएगा
मेरा आज का पारिश्रमिक ले जाएगा।
हर किसी को बोलने की आज़ादी है,
खरा खेल, फ़र्क बताएगा
न जालसाज़ी है न धोखा है,
ले जाइए पूरा पैसा ले जाइए जनाब, मौका है।

फ़र्क बताइए,
तीनों में अंतर क्या है अपना तर्क बताइए
और एक कवि का पारिश्रमिक ले जाइए।
आप बताइए नीली कमीज़ वाले साब,
सफ़ेद कुर्ते वाले जनाब।
आप बताइए? जिनकी इतनी बड़ी दाढ़ी है।
आप बताइए बहन जी
जिनकी पीली साड़ी है।
संचालक जी आप बताइए
आपके भरोसे हमारी गाड़ी है।
इनके मुँह पर नहीं पेट में दाढ़ी है।

ओ श्रीमान जी, आपका ध्यान किधर है,
इधर देखिए तमाशे वाला तो इधर है।

हाँ, तो दोस्तो!
फ़र्क है, ज़रूर इनमें फ़र्क है,
तभी तो समाज का बेड़ागर्क है।
रगों में शांत नहीं रहता है,
उबलता है, धधकता है, फूट पड़ता है
सड़कों पर बहता है।
फ़र्क नहीं होता तो दंगे-फ़साद नहीं होते,
फ़र्क नहीं होता तो खून-ख़राबों के बाद
लोग नहीं रोते।
अंतर नहीं होता तो ग़र्म हवाएँ नहीं होतीं,
अंतर नहीं होता तो अचानक विधवाएँ नहीं होतीं।

देश में चारों तरफ़
हत्याओं का मानसून है,
ओलों की जगह हड्डियाँ हैं
पानी की जगह खून है।
फ़साद करने वाले ही बताएँ
अगर उनमें थोड़ी-सी हया है,
क्या उन्हें साँप सूँघ गया है?

और ये तो मैंने आपको
पहले ही बता दिया
कि पहली में हिंदू का
दूसरी में मुसलमान का
तीसरी में सिख का खून है।
अगर उल्टा बता देता तो कैसे पता लगाते,
कौन-सा किसका है, कैसे बताते?

और दोस्तो, डर मत जाना
अगर डरा दूँ, मान लो मैं इन्हें
किसी मंदिर, मस्जिद
या गुरुद्वारे के सामने गिरा दूँ,
तो है कोई माई का लाल
जो फ़र्क बता दे,
है कोई पंडित, है कोई मुल्ला, है कोई ग्रंथी
जो ग्रंथियाँ सुलझा दे?
फ़र्श पर बिखरा पड़ा है, पहचान बताइए,
कौन मलखान, कौन सिंह, कौन खान बताइए।

अभी फोरेन्सिक विभाग वाले आएँगे,
जमे हुए खून को नाखून से हटाएँगे।
नमूने ले जाएँगे
इसका ग्रुप 'ओ', इसका 'बी'
और उसका 'बी प्लस' बताएँगे।
लेकिन ये बताना
क्या उनके बस का है,
कि कौन-सा खून किसका है?

कौम की पहचान बताने वाला
जाति की पहचान बताने वाला
कोई माइक्रोस्कोप है? वे नहीं बता सकते
लेकिन मुझे तो आप से होप है।
बताइए, बताइए, और एक कवि का
पारिश्रमिक ले जाइए।

अब मैं इन परखनलियों को v
स्टोव पर रखता हूँ, उबाल आएगा,
खून खौलेगा, बबाल आएगा।

हाँ, भाईजान
नीचे से गर्मी दो न तो खून खौलता है
किसी का खून सूखता है, किसी का जलता है
किसी का खून थम जाता है,
किसी का खून जम जाता है।
अगर ये टेस्ट-ट्यूब फ्रिज में रखूँ खून जम जाएगा,
सींक डालकर निकालूँ तो आइस्क्रीम का मज़ा आएगा।
आप खाएँगे ये आइस्क्रीम
आप खाएँगे,
आप खाएँगी बहन जी
भाईसाहब आप खाएँगे?

मुझे मालूम है कि आप नहीं खा सकते
क्योंकि इंसान हैं,
लेकिन हमारे मुल्क में कुछ हैवान हैं।
कुछ दरिंदे हैं,
जिनके बस खून के ही धंधे हैं।
मजहब के नाम पे, धर्म के नाम पे
वो खाते हैं ये आइस्क्रीम मज़े से खाते हैं,
भाईसाहब बड़े मज़े से खाते हैं,
और अपनी हविस के लिए
आदमी-से-आदमी को लड़ाते हैं।

इन्हें मासूम बच्चों पर तरस नहीं आता हैं,
इन्हें मीठी लोरियों का सुर नहीं भाता है।
माँग के सिंदूर से इन्हें कोई मतलब नहीं
कलाई की चूड़ियों से इनका नहीं नाता है।
इन्हें मासूम बच्चों पर तरस नहीं आता हैं।
अरे गुरु सबका, गॉड सबका, खुदा सबका
और सबका विधाता है,
लेकिन इन्हें तो अलगाव ही सुहाता है,
इन्हें मासूम बच्चों पर
तरस नहीं आता है।
मस्जिद के आगे टूटी हुई चप्पलें
मंदिर के आगे बच्चों के बस्ते
गली-गली में बम और गोले
कोई इन्हें क्या बोले,
इनके सामने शासन भी सिर झुकाता है,
इन्हें मासूम बच्चों पर तरस नहीं आता है।

हाँ तो भाईसाहब!
कोई धोती पहनता है, कोई पायजामा
किसी के पास पतलून है,
लेकिन हर किसी के अंदर वही खून है।
साड़ी में माँ जी, सलवार में बहन जी
बुर्के में खातून हैं,
सबके अंदर वही खून है,
तो क्यों अलग विधेयक है?
क्यों अलग कानून है?

ख़ैर छोड़िए आप तो खून का फ़र्क बताइए,
अंतर क्या है अपना तर्क बताइए।
क्या पहला पीला, दूसरा हरा, तीसरा नीला है?
जिससे पूछो यही कहता है
कि सबके अंदर वही लाल रंग बहता है।

और यही इस तमाशे की टेक हैं,
कि रंगों में रहता हो या सड़कों पर बहता हो
लहू का रंग एक है।
फ़र्क सिर्फ़ इतना है
कि अलग-अलग टैस्ट-ट्यूब में हैं,
अंतर खून में नहीं है, मज़हबी मंसूबों में हैं।

मज़हब जात, बिरादरी
और खानदान भूल जाएँ
खूनदान पहचानें कि किस खूनदान के हैं,
इंसान के हैं कि हैवान के हैं?
और इस तमाशे वाले की
अंतिम इच्छा यही है कि
खून सड़कों पर न बहे,
वह तो धमनियों में दौड़े
और रगों में रहे।
खून सड़कों पर न बहे
खून सड़कों पर न बहे
खून सड़कों पर न बहे।

Monday, November 15, 2021

भईया देहाती || भोजपुरी कविता || गोपाल सिंह नेपाली|| चम्पारण के लोग हंसेला || PoemNagari

तुम इतने प्यारे थे तुमसे 
पूरी दुनिया सरल हुई हम इतने मुश्किल थे जो 
तुमसे भी हल न हो पाए
किस्मत ने हम दोनों को 
हर युग में ही मिलवाया है हम अपना मिलना लेकिन 
हर बार सफल न कर पाए
धूप तुम्हारे रूप की कैसे 
दो आँखों में भर पाते कैसे अम्बर के प्रश्नों का 
धरती पर उत्तर पाते
हम तो शापित प्रेमी हमको 
न कोई अधिकार मगर जादूगर भी इस दुनिया को 
तुम जैसी न कर पाते

नमस्कार दोस्तों, अमन अक्षर जी की लाजबाव लाईनों के साथ 
आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है हमारे यूट्यूब चैनल पोयम नगरी में, 
आज का दिन मेरे लिए बहुत ही खास है, क्योंकि आज मेरा जन्मदिन है , इसके पहले की आप आज के खास इस कार्यक्रम में खो जाएं , मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूं , उन तमाम मित्रों का जिन्होंने सुबह से लगातार जन्मदिन की शुभकामनाएं वाले मैसेजो से मोबाइल फ़ोन में भुचाल मचा रखें हैं , आप सभी के प्यार और आशीर्वाद का मैं ऋणी हुं ।

प्यारे मित्रों , मैं आशा करता हूं की आप सभी जहां भी होंगे बड़े मजे में और प्यार से होंगे, कोविड के बाद ज़िन्दगी फिर से वापस चल पड़ी है , एक नई उमंग और जोश के साथ - कभी कभी चुनौतियां एक अद्भुत चमत्कार के रूप में विकसित होकर हमारे जीवन को बेहतर बना जाती हैं और मुझे लगता है कि जिस तरह हम सभी में इस महासंकट के समय - "सर्व जन हिताय सर्वजन सुखाय " की भावना विकसित हुई है - वो और बढ़ेगी और मजबूत होगी,
 इसी प्रकार एक और महामारी जो आज भी विश्व को अलग-अलग खेमों में काटती - छाटती रहती है- Radicalism , कट्टरपंथ की भावना , अब वक़्त आ गया है कि हम सभी वैश्विक समावेशी समाज की ओर अग्रसर हो , जो हो भी रहा है ।
 भाषा, धर्म, जाति , सम्प्रदाय के रूप में सहज हो, एक दूसरे के विकास में सहयोगी बनें ना कि विरोधी । अपनी भाषा अपनी बोली की मधुरता को जीए उससे सीखें - यह हमें बहुत कुछ सिखा सकतीं हैं साथ ही कुछ कुरितियां भी होंगी जिसे सहजता से दूर करने की भी जरूरत होंगी - 

 आज मैं अपनी बोली " भोजपुरी " में आपको एक बहुत ही प्यारी कविता सुनाऊंगा, लेकिन उसके पहले कुछ मित्रों के सवालों का जबाव देना चाहता हूं जो अक्सर मुझे message करके पुछते रहते हैं की मैं कहां हूं और क्या कर रहा हूं - 
तो प्यारे मित्रों सबसे पहले मैं यह बताना चाहता हूं कि मैं आप सभी को बहुत याद करता हूं - जब भी आपकी मैसेज आती है साथ में एक लम्बी यादों की बारात भी लाती है । लेकिन समय का ताकाज - हम सभी को अपने- अपने कार्य क्षेत्र में बांधे रखा है- मैं अभी New Delhi में हुं , COVID के पहले मैंने master Complete करा है English Literature में , और अभी प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहा हुं पीछले महिने मैंने Upsc Prelims की exam दी है और अगले महीने में ugc net का exam दूंगा - अभी कोई जगह नहीं मिल पाया है , मगर मेहनत जारी है । 
कहते हैं ना की - 
जीत और हार आपकी सोच पर निर्भर करता है ,
मान लो तो हार और ठान लो तो जीत ।
अब मैं जो कविता आपको सुनाने जा रहा हूं वह गोपाल सिंह नेपाली जी द्वारा लिखित है , इसके पहले भी मै नेपाली जी की कुछ कविताएं आप सभी को सुनाई है , लेकिन यह कविता कुछ विशेष है - पहली बात तो यह की यह कविता नेपाली जी और मेरी मातृभाषा भोजपुरी में है , जिसका मिठास ही अलग है , दूसरी बात यह की यह कविता चम्पारण के गौरवशाली इतिहास को उजागर करती है और इसकी विशेषता से साक्षात्कार कराता है ।
 कविता का टाईटल है " चम्पारण के लोग हंसेला " |
 
उत्तर और सोमेसर खड़ा , दखिन गंडक जल के धारा,
पूरब बागमति के जानी , पश्चिम में त्रिवेणी जी बानी ।।
माध मास लागेला मेला,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
त्रिवेणी के नामी जंगल ,
जहवां बाघ करेला दंगल ,
 बड़का दिन की छुट्टी होला,
बड़-बड़ हाकिम लोग जुटेला ,
केतना गोली रोज छुटेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
नदी किनारे सुंदर बगहां ,
मालन के ना लागे पगहा ,
परल इहां संउसे बा रेत ,
चरके माल भरेले पेट ,
रेल के सिलपट इन्हा बनेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।


इन्हा मसान नदी बउरहिया ,
ऊपर डुगरे रेल के पहिया ,
भादों में जब इ फुफआले,
एकर बरनन करल ना जाले ,
बड़का- बड़का पेड़ दहेला, 
चम्पारण के लोग हंसेला ।
इहे रहे विराट के नगरी ,
जहवां पांडव कईलें लीला ,
इहवें बा विराट के टीला ,
बरनन वेद-पुराण करेला,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
परल इंहवा पानी के टान ,
अर्जुन मरलें सींक के बाण,
सींक बाण धरती में गईल,
सिकरहना नदी बह गईल,
जेकर जल हर घड़ी बहेला,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
रामनगर राजा नेपाली,
मांगन कबों ना लौटें खाली ,
इहां हिमालय के छाया बा ,
इन्हा अजबे कुछ माया बा ,
एही नदी में स्वर्ण दहेला,
चम्पारण के लोग हंसेला ।


रामनगर के धनहर खेती ,
एकहन खेत रोहू के पेटी ,
चार महीना लोग कमाला ,
आठ महीना बइठल खाला ,
दाना बिना केहु ना मरेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
इहां जाई चानकी पर चढ़,
देखी लौरिया में नंदनगढ,
केहु कहे भीम के लाठी ,
गाड़ल बा पत्थर के जाथी ,
लोग अशोक के लाट कहेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
नरकटियागंज देखीं गाला ,
मंगर शनिचर हाट के हाला ,
अन्न इहां ना मिली बाउर,
भात बने बटुआ गमकेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
आगे बढ़ी चलीं अब बेतिया ,
बीच राह में बा चनपटिया ,
इहां मिलें मरचा के चिउरा ,
किन-किन लोग भरेला दउरा, 
गाड़ी- गाड़ी धान बिकेला,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
बेतिया राजा के राजधानी ,
रहले भूप करन अस दानी ,
पच्छिम उदयपुर बेंतवानी ,
बढ़िया सरेयां मन के पानी ,
दूर -दूर के लोग पियेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।


बेतिया के मीना मशहूर,
गिरिजाघर भूकंप में चूर ,
बाड़े अब-तक बाग़ हजारी,
मेला लागे दशहरा के भारी ,
हाथी,घोड़ा , बैल , बिकेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
आलू डगरा बस बेतिया के ,
भेली सराहीं जोगिया के ,
गुड़ चीनी के मात करेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
बेतिया के दक्षिण कुछ दूर ,
बथना गांव बसल मशहूर ,
इहां बा लाला लोग के बस्ती,
धंधा नौकरी और गिरहस्ती ,
एमे केतना लोग बसेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
चम्पारण के गढ़ मोतिहारी,
भईल नाम दुनिया में भारी ,
पहिले इहे जिला जागल ,
गोरन का मुंह करिखा लागल,
नीलहा अबतक नाम जपेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
गांधी जी जब भारत में अइलें ,
पहिले इहवा सत्याग्रह कईले ,
लीलहा देखी भाग पराईले ,
तब से ना चम्पारण आइले,
मोतिहारी के नाम जपेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।


गोरे- गोरखा भइल लड़ाई ,
हारे पर जब भइलें गोरा ,
धर दिहले गोली के बोरा ,
भईल सुलह इतिहास कहेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
कंवराथियां के देखीं राबा ,
अरेराज बउराहवा बाबा ,
नामी अरेराज के मेला ,
आके दरशन लोग करेला ,
फागुन तेरस नीर चढेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
छपरा जिला गोरखपुर बस्ती, 
जेकर इंहा होत परवस्ती,
केहू नोकरी केहू नाच करेला ,
मांगन लोग दिन-रात रहेला ,
केतना लोटा झाल बजेला, 
चम्पारण के लोग हंसेला ।
खाए में जब खटपट भइलें,
भाग के तब चम्पारण अईलें ,
मांगी-चांगी के धन-धान्य कमइले ,
मांगन से बाबू बन गईलें ,
अइसन केतना लोग बसेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
सब दिन खईलें सतुआ लिट्टी ,
इहां परल देहिया पर पेटी ,
बाप के दुःख भूल गईलें बेटा, 
भोर परल माटी के मेटा ,
अब त लाख पर दिया जरेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।


का करिहें कविलोग बड़ाई ,
जग चम्पारण के गुण गाई ,
आपन कमाई अपने खाला ,
केहू से ना मांगें जाला ,
 ए देख दुश्मन ठठुरेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
रहले उ कविचूर के साथी ,
इहवें के भईया देहाती,
कविता बा उ देहिया नईखें ,
गगरी भरल खींचाते नईखें ,
रटना अबहीं लोग करेला ,
चम्पारण के लोग हंसेला ।
  
प्यारे मित्रों मैं मानता हूं की इसी प्रकार हरेक क्षेत्र विशेष की अपनी अपनी बिशेषताएं है , हमारा देश भारतवर्ष तो इसी अनेकाता और बिशेषता के संगम सेतू का गठजोड़ है । अनेकता में एकता ही हमारी ताकत है ।
आज का मेरा यह प्रयास आपको कैसा लगा , अपनी प्रतिक्रिया जरूर लिखी , फिर मिलते हैं ,तब तक के लिए नमस्कार ।

जो जीवन ना बन सका ! || That Could Not Be Life ! || PoemNagari || Hindi Kavita

कविता का शीर्षक - जो जीवन ना बन सका ! Title Of Poem - That Could Not Be Life ! खोखले शब्द  जो जीवन ना बन सके बस छाया या  उस जैसा कुछ बनके  ख...